आयुर्वेद स्वस्थ जीवन जीने की एक कला है-

‘आयुर्वेद ’ विश्व की सबसे प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। आयुर्वेद सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति ही नहीं है बल्कि यह स्वस्थ जीवन जीने की एक कला है। अगर इसे सीख लिया तो बगैर किसी डॉक्टर या अस्पताल के चक्कर लगाए स्वस्थ जीवन जीना संभव है। आयुर्वेद के बताये रास्तों पर चलकर एक खुशहाल और निरोगी जीवन जिया जा सकता है।
आज की जटिल जीवन शैली, खान पान के हिसाब से निरोगी जीवन जीने के लिए आयुर्वेद बहुत ही जरुरी है और यही कारण है कि यह एक विश्वसनीय चिकित्सा पद्धति के रुप में यह विश्वभर में उभर कर सामने आया है। आयुर्वेद का उद्देश्य ही स्वस्थ प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगियों को रोग मुक्त बनाना है।

इस संदर्भ में एक श्लोक है-
“प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्यविकारप्रशमनं च” (चरकसंहिता)।

अर्थात : आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना तथा रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना है।
प्राचीन आचार्यों ने आयुर्वेद में शामिल शब्दों 'आयु' और 'वेद' के व्यापक अर्थ बताये हैं। 'आयु' शब्द के सन्दर्भ में, 'शरीर', 'मन', इन्द्रियाँ', तथा 'आत्मा' के संयोग को 'आयु' कहा गया है।

इसी तरह 'वेद' शब्द के अर्थ हैं - ज्ञान, ज्ञान के साधन, ज्ञान के लाभ, विचार, गति तथा प्राप्ति।

इस प्रकार 'आयु' के 'वेद' अर्थात 'ज्ञान' को 'आयुर्वेद' कहते हैं।
दूसरे शब्दों में वह शास्त्र जिसमें आयु के स्वरुप, उसके विविध प्रकार, आयु के लिए हितकारक और अहितकारी, इन्द्रिय, मन, और आत्मा, इनमें सभी या किसी एक के विकास के साथ हित, सुख और दीर्घ आयु की प्राप्ति के साधनों का तथा इनके बाधक विषयों के निराकरण के उपायों का विवेचन हो उसे ही आयुर्वेद कहते हैं।

आयुर्वेद को अलग-अलग तरह से परिभाषित किया गया है।

चरक संहिता में एक श्लोक है-
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
(अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःख आयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।)
चरक संहिता आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। यह संस्कृत भाषा में है।
चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि मान्य ग्रन्थकार आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं। इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद की रचनाकाल ईसा पूर्व 3,000 से 50,000 वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास की है।

आयुर्वेद के बारे में कहा जाता है सर्वप्रथम ब्रह्मा जी से प्रजापति ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने यह विद्या सीखा।
एक अन्य किंवदंति के अनुसार इस शास्त्र के आदि आचार्य अश्विनीकुमारों माने जाते हैं उन्होंने ऐसा चमत्कार कर दिखाया जिससे सभी अभिभूत हो गये। उन्होंने दक्ष प्रजापति के धड़ में बकरे का सिर जोड़ दिया था। अश्विनी कुमारों से भगवान इंद्र ने यह विद्या प्राप्त की। वैदिक साहित्य में भगवान इन्द्र को सर्वोच्च महत्ता प्राप्त है। इसके बाद भगवान इंद्र ने भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। काशी के राजा दिवोदास भगवान धन्वंतरि के अवतार कहे गए हैं।
भगवान धन्वन्तरी के चार भुजा हैं, इनके एक हाथ में आयुर्वेद ग्रंथ, एक हाथ में औषधि कलश, एक हाथ में जड़ी-बूटी और एक हाथ में शंख है। ये प्राणियों को आरोग्य प्रदान करते हैं। इन दिनों तेजी से बढ़ रही बीमारियों को देखते हुए आधुनिक चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ अगर आयुर्वेद को अपना लिया जाए तो बेहतर स्वास्थ्य हासिल किया जा सकता है।
वैसे तो सभी वेदों में आयुर्वेद का उल्लेख है लेकिन अथर्ववेद में इसका अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।

इसमें आयुर्वेद के बारे में विस्तृत विवरण है। अथर्ववेद ही आयुर्वेद का मूल आधार है। अथर्ववेद में आयुर्वेद से संबंधित विभिन्न विषयों का वर्णन उपलब्ध है।

श्लोक –
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥

भावार्थ :
जिस मनुष्य के दोष वात, पित्त और कफ, अग्नि (जठराग्नि), रस आदि सात धातु, सम अवस्था में तथा स्थिर रहते हैं, मल-मूत्र आदि की क्रिया ठीक होती है और शरीर की सब क्रियायें समान और उचित हैं, और जिसके मन इन्द्रिय और आत्मा प्रसन्न रहें वह मनुष्य स्वस्थ है ।


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